रविवार, 25 नवंबर 2018

नमस्ते दोस्तों अभिषेक 

BY ~ ABHISHEK KUMAR{(Mob . xxxxxxxxxx  email . xxxxxxxxxx@gmail.com )(N.B. BOOK )}
निम्न पर ध्यान दें !
1.     कुछ संकेतो के पूरा नाम
                          i.     M.C.-  menstural  cycle
                        ii.     W.H.O. - world health organization
                       iii.     S.T.D. - sexually transmitted diseases
                       iv.     H.I.V.  -  human immuno deficiancy virus
                         v.     A.I.D.S.  -  acquired immuno deficiency syndrome
                       vi.     I.U.C.D.  - intra uterine contraceptive device
                      vii.     B.C.M. - birth control methods
                    viii.     D.N.A.  - deoxyribo nucleic acid
                       ix.     R.N.A. - ribo nucleic acid
                         x.     A.T.P.  - adenosine triphosphate
                       xi.      R.B.C.   - red blood cell
                      xii.     W.B.C.  -  white blood cell
2.     कुछ सामान्य पदार्थो के नाम और रासायनिक सूत्र
           i.  NaCl  ~ सोडियम क्लोराईड (साधारण नमक)
          ii.  HCl ~ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल
         iii.  NaOH ~ सोडियम हाईड्राऔक्साइड (काष्टिक सोडा)
         iv.  NaHCO3 ~ सोडियम बाई कार्बोनेट (खाने का सोडा)
          v.  Na2CO3.10H2O ~ सोडियम कार्बोनेट डेका हाइड्रेट (धोवन सोडा)
         vi.  CaOClCl/CaOCl2~ कैल्सियम ऑक्सीक्लोराइड (विरंजक चूर्ण / ब्लिचिंग पाउडर)
         vii.  CH3COONa ~ सोडियम एसीटेट
        viii.  KHC4H4O6 ~ टार्टरिक अम्ल
         ix.  CH3COOH ~ एसीटिक अम्ल
          x.  H2CO3 ~ कार्बोनिक अम्ल
         xi.  H3BO3 ~ बोरिक अम्ल
         xii.  HCOOH ~ फार्मिक अम्ल
        xiii.  H2SO3 ~ सल्फ्यूरस अम्ल
        xiv.  H2SO4 ~ सल्फ्यूरिक अम्ल
         xv.  HNO3 ~ नाइट्रिक अम्ल
        xvi.  CaO ~ कली चुना
        xvii.  CaCO3 ~ संगमरमर
       xviii.  Ca(OH)2  ~ बुझा हुआ चुना
        xix.  CO2 (s) ~ सूखा/सुष्क बर्फ
         xx.  H2O (g) ~ भाप
        xxi.  C6H12O6  ~ ग्लूकोज/शर्करा
        xxii.  C12H22O11 ~ चीनी  
       xxiii.  C2H5OH ~ एथोनोइक अम्ल
       xxiv.  C3H6O6  ~ लैक्टिक अम्ल 




दोस्तों मैंने रसायन शास्त्र से सम्बंधित कुछ रासायनिक पदार्थ का नाम और उसके सूत्र पोस्ट किये है यदि आप को इसका उपयोग हुआ हो तो हमें कमेंट करे और किसी भी प्रकार के प्रश्न  के लिए आप हमसे जुड़ सकते है 
हम सभी प्रश्न का जवाब देने का प्रयाश करेंगे 

दोस्तों यदि आप 10th में है और अच्छे अंक लाना चाहते है तो दिए गए लिंक खोलकर रासायनिक समीकरण को याद कर ले एवं गणित के सूत्र पर कमान करे

क्षेत्रमिति का प्रश्न

1. एक बेलन के उचाई 21cm तथा त्रिज्या 7cm है का पृष्ठीय क्षेत्रफल ज्ञात करे
 
2. एक शंकु के त्रिज्या एवं उचाई क्रमशः 14cm एवं 28cm है का आयतन ज्ञात करे
   
3. 7cm त्रिज्या वाले गोला का पृष्ठ क्षेत्रफल एवं आयतन ज्ञात करे
 
4. एक खोखला अर्धगोला का बाह्य त्रिज्या 14cm है यदि धातु के मोटाई 4cm हो तो उस अर्धगोला मे कितने        पानी आयेगा
   
5. एक विसमबाहु त्रिभुज के क्षेत्रफल ज्ञात करे जिसके परिमाप 32m तथा शेष दो भुजा 11m और 6m है
   
6. एक बेलनाकार टंकी के आयतन ज्ञात करे जिसके आधार का व्यास 4.2cm तथा उचाई 4.5m है
   
7. एक बेलनाकार पेट्रोल की टंकी जिसकी बाह्य त्रिज्या 2.42m है तथा धातु के मोटाई 2cm है यदि टैंक के दोनों सिरे अर्धगोलाकार है तथा सम्पूर्ण टैंक के लंबाई 7.04m हो तो उस टैंक मे कितने का पेट्रोल है यदि 1l पेट्रोल 80रु मे मिलता हो
 
8. एक कुएं की मिट्टी खोदने मे 75 पैसे प्रति घन मीटर की दर से 115.5रु लगता है यदि कुएं का व्यास 2.8m हो तो इसकी गहराई निकले
   
9. 11cm किनारे वाले घन से 7cm व्यास वाले बेलन लम्बवत काटा गया है अब शेष ठोस का सम्पूर्ण पृष्ठ क्षेत्रफल ज्ञात करे
   
10. एक शंकु जिसकी उचाई 8cm है का वक्रपृष्ठ क्षेत्रफल 188.4cm2 है शंकु का आयतन ज्ञात करे
   
11. एक ठोस बेलन जिसके त्रिज्या 30cm एवं उचाई 40cm है से एक शंकु समान आधार और उचाई का काटा गया है इस प्रकार शेष ठोस  का सम्पूर्ण पृष्ठ क्षेत्रफल ज्ञात करे
 
12. किसी शंकु के त्रिज्या और उचाई की अनुपात 3:4 है यदि इसका आयतन 301.44m3  हो तो शंकु के पृष्ठिय क्षेत्रफल ज्ञात करे
   
13. उस बड़े-बड़े शंकु के आयतन ज्ञात करे जो 28cm किनारे वाले घन से काट कर बनाया गया हो
 
14. एक शंकु को पिघलाकर तीन गोला 2cm, 3cm, तथा 4cm त्रिज्या के बनाया जाता है यदि शंकु के उचाई 11cm हो तो शंकु के त्रिज्या ज्ञात करे
 
15. शीशे के एक गोले जिसके व्यास 20cm है से 2cm त्रिज्या वाले कितने गोले बनाये जा सकते है
 
16. 21cm उचाई और 28cm व्यास वाले बेलन पानी से पूर्णतः भरा है यदि बेलन मे 2cm व्यास वाले 20 गोले डाले जाय तो बेलन मे बचे पानी का आयतन ज्ञात करे
 
17. किसी गोला का आयतन तथा पृष्ठ क्षेत्रफल समान है उस गोले को पिघलाकर 1cm त्रिज्या वाले कितने गोले बनाये जा सकते है
   
18. एक खिलौना जो बेलन के एक सिरे पर शंकु तथा दूसरे सिरे पर अर्धगोला के मिलने से बना है यदि प्रत्येक के आधार के त्रिज्या 4cm ताथा उचाई 3cm हो तो खिलौना का पृष्ठिय क्षेत्रफल ज्ञात करे
   
19. एक आयताकार पार्क जिसके लंबाई 20m तथा चौराई 15m है के चरो ओर 2m चौरी रास्ता बनवाना है 5रु/m2 की दर से रास्ता बनवाने का खर्च ज्ञात करे
   
20. एक तार से वर्ग बनाया जाता है जिसका क्षेत्रफल 100m2 होता है यदि इसी तार को मोड़कर समबाहु त्रिभुज बनाया जाय तो इस त्रिभुज का क्षेत्रफल क्या होगा

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

यौन आचरण से क्या समझते है

  यौन संबंध(सरीरिक संबंध) का चित्र

इस प्रकार के किसी भी सरीरिक संबंध के लिए जीवो के मन मे उत्पन्न विचार को यौन आचरण कहते है !
अर्थात मनुष्य मे सरीरिक संबंध बनाने के लिए जो भावना उत्पन्न होता है यौन आचरण कहलाता है!
तथा इस प्रकार के क्रिया को यौन सम्बन्ध या संभोग या मैथुन क्रिया कहते है 

NOTE  मै इस पोस्ट के माध्यम से सिर्फ यौन आचरण को समझाया है ना की ऐसा करने को प्रेरित किया है यदि ऐसा आप करते है तो आप के ऊपर कानूनी कार्रवाई लागू होगी और इसके लिए मै या मेरे पोस्ट का कोई गलती नहीं है

नमस्ते मै अभिषेक इस पोस्ट के माध्यम से मै यौन आचरण को समझाया है यदि आपको किसी भी प्रकार का हेल्प (class 10th तक मे) चाहिए तो आप हमारे ईमेल से जुड़ सकते है 

पौधा में परिवहन कैसे होता है

पौधा में खनिज लवण जल और खाद्य पदार्थ का परिवहन संबहन बंडल द्वारा होता है 
संबहन बण्डल दो प्रकार के होता है 
  1. जाइलम /दारू (Xylem)
  2. फ्लोएम /वल्कल (Phloem)

A. जाइलम (Xylem):


Xylem शब्द नागेली द्वारा दिया गया था। यह पादप में पानी और खनिज के परिवहन का कार्य करता है। यह फ्लोएम (Phloem) के साथ मिलकर संवहन बंडलों (Vascular Bundle) का निर्माण करता है। इसमें दोनों मृदूतक (Parenchyma) और स्थुलकोणोतक (Collenchyma) कोशिकाएं पायी जाती हैं। अवयव के आधार पर जाइलम को प्राथमिक जाइलम (Primary xylem) और द्वितीयक जाइलम (Secondary xylem)  में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्राथमिक जाइलम पादप के शरीर की प्राथमिक वृद्धि (Primary growth) में उपस्थित होते है, और प्राक एधा (Procambium) की कोशिकाओं से उत्पन्न होता है। यह प्रोटोजाइलम (Protoxylem) और मेटाजाइलम (Metaxylem) में विभेदित होता है। पादप की द्वितीयक वृद्धि (Secondary growth) के कारण द्वितीयक जाइलम (Secondary Xylem) का निर्माण होता है।
यह चार घटकों से बना है –
(ए) वाहिनिकाएं (Tracheid)
(बी) वाहिकाएं (Vessels)
(सी) जाइलम तंतु (Xylem Fibres)
(डी) जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma)


 (ए) वाहिनिकाएं (tracheid):

वाहिनिकाएं (tracheid) पानी के परिवहन में मदद करती है। यह यांत्रिक सहारा (Mechanical Support) और लकड़ी का निर्माण भी करती है। ये लम्बी, संकीर्ण गुहा, तथा नुकीले सिरों वाली कोशिकाएँ है। इनकी कोशिका भित्ती में लिग्निन का जमाव होता है। कोशिका भित्ति में स्थूलन (thickening) वलयाकार (Annular), सर्पिल (Spiral), सोपानवत् (Scalariform), जालिकावत (Reticulate), या गर्ती (Pitted) प्रकार का हो सकता है। वाहिनिकाएं (tracheid) टेरिडोफाइट, जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्मों में पाए जाते हैं। वाहिनिकाएं (tracheid) एक दूसरे के ऊपर जुड़कर लंबी पंक्ति बनाते हैं परन्तु आपस में क्रॉस भित्ति द्वारा अलग रहते है।

(बी) वाहिकाएं  (Vessels):

ये लम्बी, चौड़े सिरे वाली, तथा चौड़ी अवकाशिका वाली बेलनाकार तत्व हैं। ये पानी के संवहन में पाइप लाइन की तरह कार्य करती है। इनकी कोशिका भित्ति पर लिग्निन का जमाव होता हैं, और जमाव या स्थूलन (thickening) वलयाकार, सर्पिल, सोपानवत या जालीदार हो सकता है। कोशिका भित्ती में कई परिवेशित गर्त (Boarded Pits) होते हैं। वाहिकाओं की अंत: भित्ती छिद्रित प्लेटों के रूप में पायी जाती है। वाहिकाएं  (Vessels) कठोर लकड़ी या छिद्रित लकड़ी का निर्माण करती हैं। संकीर्ण अवकाशिका या गुहा वाली वाहिकाएं  (Vessels) प्रोटो जाइलम में और  चौड़ी अवकाशिका या गुहा वाली वाहिकाएं  (Vessels) मेटा जाइलम में जाती है। वाहिकाएं  (Vessels) पानी के परिवहन, पादप को यांत्रिक सहारा और लकड़ी का निर्माण का कार्य करती है।
आम तौर पर वाहिकाएं  (Vessels) सभी एंजियोस्पर्म में पायी जाती हैं। लेकिन winteraceae, Tetracentraceae, Trochodendraceae कुल में नहीं पायी जाती और जिम्नोस्पर्म में यह अनुपस्थित होती है। लेकिन Gnetum, Welwitschia and Ephe­dra में पाया जाता है। Yucca, Dracaena, Dejineria, में वाहिकाएं  (Vessels) अनुपस्थित होती हैं।

(सी) जाइलम तंतु (Xylem Fibres) Xylem:

ये जाइलम में पाए जाने वाली मृत दृढ़ोतक कोशिकाएँ है। ये लंबे, मोटी लिग्निन युक्त कोशिका भित्ती और नुकीले सिरों कोशिकाएँ हैं। इनकी मात्रा द्वितीयक जाइलम में अधिक होती है यह यांत्रिक सहारा प्रदान करती है।

 (डी) जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma):

यह जाइलम का जीवित घटक हैं। ये मृदूतकी, पतली कोशिका भित्ती वाली, अंडाकार या लम्बी कोशिकाएँ है, जो प्राथमिक और द्वितीयक जाइलम दोनों में पायी जाती हैं। यह मुख्य रूप से स्टार्च और वसा को संग्रहीत करने में मदद करता है। यह मज्जा किरणों के गठन करता है। जो पानी का उसके परिधीय भागो में यानी अरीय संवहन करता है
चार घटकों में से केवल xylem parenchyma जीवित है और बाकी सभी भाग मृत होते हैं।

जाइलम के कार्य:

  1. वाहिनिकाएं (tracheid) तथा वाहिकाएं  (Vessels) पादप की जड़ो से ऊपर पत्तियों की ओर पानी और खनिज के प्रवाह का कार्य करते हैं। ये क्रमशः नरम (Soft) और कठोर लकड़ी (Hard Wood) के निर्माण में मदद करते हैं।
  2. जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma) भोजन का संग्रहण करता है।
  3. जाइलम तंतु (Xylem Fibres) यांत्रिक सहारा प्रदान करता है।

B. फ्लोएम (Phloem):

शब्द फ्लोएम (Phloem) नागेली द्वारा गया। यह स्थायी जीवित जटिल ऊतक है। इसके द्वारा पादप के विभिन्न भागों में पत्तियों से प्रकाश संश्लेषण उत्पाद का सूक्रोज के रूप में स्थानांतरण किया जाता है। इसे बास्ट या leptome भी कहा जाता हैं।
उद्भव के आधार पर फ्लोएम को प्राथमिक फ्लोएम और द्वितीयक फ्लोएम में बांटा जाता है प्राथमिक फ्लोएम प्राक एधा (Pro-cambium) से और द्वितीयक फ्लोएम संवहन एधा (Vascular Cambium) से होता है
विकास के आधार पर प्राथमिक फ्लोएम को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है, जिनको प्रोटोफ्लोएम   व मेटाफ्लोएम कहते है। प्रोटोफ्लोएम में संकरी चालनी नलिका जबकि मेटाफ्लोएम में बड़ी चालनी नलिका होती है ।
Phloem चार घटकों से बना है-
(ए) चालनी नलिका (Sieve Tubes)
(बी) साथी कोशिकाएं  (Companion Cells)
(सी) फ्लोएम मृदूतक (Phloem parenchyma)
(डी) फ्लोएम तंतु (Phloem Fibres)


 (ए) चालनी नलिका (Sieve Tubes)  :

ये लम्बी बेलनाकार एवं  जीवित कोशिका है। जो नलिका की तरह दिखाई देती है। ये सेल्यूलोज की पतली भित्ती युक्त कोशिकाएँ है। परिपक्व चालनी नलिका (Sieve Tubes)  में केन्द्रक अनुपस्थिति होता हैं, और जीवद्रव्य में बड़ी रिक्तिका पायी जाती है। जिम्नोस्पर्म में, चालनी नलिका (Sieve Tubes)  के स्थान पर चालनी कोशिका (Sieve Cell) होती हैं। दो चालनी नलिका (Sieve Tubes)  के बीच कई छिद्रित चलानी प्लेटें पायी जाती हैं।
सर्दियों के मौसम के दौरान एक पॉलिसैक्रेराइड पदार्थ जिसका नाम callose है,  चालनी प्लेटों पर जमा हो जाता है। जिसे केलोज प्लग कहते है। ये केलोज प्लग भोजन के परिवहन को रोकते हैं। वसंत की वापसी पर, एंजाइम callase की मदद से केलोज प्लग का अपघटन हो जाता है। और भोजन का  परिवहन फिर से शुरू हो जाता और पौधे के विकास की शुरुआत हो जाती हैं। callose β-1,3- glucan होता है
चालनी नलिका जीवित सिनसाइट जबकि वाहिनिकाएं मृत सिनसाइट है।

(बी) साथी कोशिका (Companion Cells):

ये लम्बी, संकीर्ण, पतली भित्ती वाली जीवित कोशिकाएँ होती है जो चलनी नलिका से जुड़ी हुई होती है। चालनी नलिका (Sieve Tubes)  और साथी कोशिका गर्त के माध्यम से जुड़ी हुई होती हैं। जिम्नोस्पर्म में साथी कोशिकाओं की जगह एल्बुमिन्स कोशिकाएं / स्ट्रासबर्गर कोशिका पायी जाती हैं। साथी कोशिकाएं  (Companion Cells) चालनी नलिकाओं (Sieve Tubes)के साथ भोजन के परिवहन में मदद करती हैं। साथी कोशिकाओं का केन्द्रक चालनी नलिकाओं (Sieve Tubes)के कार्य को नियंत्रित करता है। क्योंकि चालनी नलिकाओं (Sieve Tubes) में केन्द्रक नहीं पाया जाता। Austrobaileya एक एंजियोस्पर्म है, जिसमें साथी कोशिका नहीं पायी जाती।

 (सी) फ्लोएम मृदूतक(Phloem Parenchyma):

यह लम्बी, नुकीले, जीवित, मृदूतकी कोशिका है। यह सभी एकबीजपत्री पादपो और द्विबीजपत्री रैननकुलस में अनुपस्थित होती है। बास्ट मृदूतक भी कहलाता हैं।

(डी) फ्लोएम  तंतु(Phloem Fibres):

ये मृत लम्बी दृढ़ोतक कोशिकाएं हैं। जो लिग्निन के जमाव वाली, गर्त युक्त भित्ती वाले होते हैं। यह चालनी तत्वों (चालनी कोशिका व चालनी नलिका (Sieve Tubes)) को दृढ़ता प्रदान करता है। ये प्राथमिक में फ्लोएम (Phloem) अनुपस्थित  और द्वितीयक फ्लोएम (Secondary Phloem) में पाये जाते हैं। यह यांत्रिक सहारा प्रदान करने का कार्य करता है।

चार घटकों में से केवल फ्लोएम तंतु मृत होता है और बाकी सभी जीवित होते हैं।

फ्लोएम (Phloem)  के कार्य:

  1. यह पादप के शीर्ष से आधार तक भोजन का स्थानांतरण करता है।
  2. द्वितीयक फ्लोएम (Secondary Phloem) तंतु जैसे जूट तंतु आर्थिक मूल्य के हैं।
  3. फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma) रेजिन, लैटेक्स एवं म्युसिलेज आदि का संग्रहण करता है
  4. फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma) भोजन का अरीय संवहन करता है
  • जटिल ऊतक – जाइलम एवं फ्लोएम (Xylem And Phloem in Hindi)

नमस्ते दोस्तों मै अभिषेक इस पोस्ट के माध्यम से आप को पौधा में खनिज लवण जल और खाद्य पदार्थ का परिवहन को बताया है अगर आपको हमारा ब्लॉग  पसंद आया ओर आपको इससे लाभ हुआ है तो commment करना ना भूले यदि आप चाहते है कि हम ऐसे हिंदी ओर भी ब्लॉग डाले तो आप इसे facebook, whatspp  पर शेयर कीजिये
साथ ही यदि आपको किसी भी प्रश्न का जवाब चाहिए तो आप हमें संपर्क फॉर्म से मिल सकते है 
 धन्यवाद

शनिवार, 27 अक्टूबर 2018

स्त्री जनन तंत्र का नामांकित चित्र

स्त्री जनन तंत्र का बाह्य नामांकित चित्र 
स्त्री जनन तंत्र का आरेखीय-काट दृश्य
स्त्री जनन तंत्र के अन्तर्गत एक जोड़ा अंडाशय (ओवरी)
के साथ-साथ एक जोड़ा अंडवाहिनी (ओविडक्ट), एक गर्भाशय (यूटेरस), एक गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स)
तथा एक योनि (वेजाइना) और बाह्य जननेन्द्रिय
(एक्सटर्नल जेनिटेलिया) शामिल होते
हैं जो श्रोणि क्षेत्र में होते हैं। जनन तंत्र के ये सभी अंग एक जोड़ा स्तन ग्रंथियों
(मैमरी ग्लैंड्स) के साथ संरचनात्मक
तथा क्रियात्मक रूप में संयोजित होते है. जिसके पफलस्वरूप अंडोत्सर्ग, (ओव्यूलेशन), निषेचन (पफर्टिलाइजेशन), सगर्भता (प्रेगनेन्सी), शिशुजन्म तथा शिशु की देखभाल की प्रक्रियाओं में सहायता
मिलती है। अंडाशय स्त्री के प्राथमिक लैंगिक अंग हैं जो स्त्री युग्मक (अंडाणु/ओवम) और कई स्टेराॅयड हार्मोन (अंडाशयी हार्मोन) उत्पन्न करते हैं। उदर के निचले भाग
के दोनों ओर एक-एक अंडाशय स्थित होता है । प्रत्येक अंडाशय की लम्बाई 2 से 4 से.मी.
के लगभग होती है और यह श्रोणि भित्ति तथा गर्भाशय से स्नायुओं (लिगामेंट्स) द्वारा जुड़ा होता है। प्रत्येक अंडाशय एक
पतली उपकला (एपिथिलियम) से ढका होता है
जो कि अंडाशय पीठिका (ओवेरियन स्ट्रोमा) से जुड़ा
होता है। यह पीठिका दो क्षेत्रों-एक परिधीय वल्वुफट (पेरिपफेरल काॅर्टेक्स) और एक आंतरिक मध्यांश (मेडुला) में विभक्त होता है। अंडवाहिनियाँ (डिम्बवाहिनी नलिका/पफेलोपियन नलिका), गर्भाशय तथा योनि मिलकर स्त्री सहायक नलिकाएँ बनाती हैं।
प्रत्येक डिम्बवाहिनी नली लगभग 10-12 से.मी. लम्बी होती है, जो प्रत्येक अंडाशय की परिधी से  चलकर गर्भाशय तक जाती
है। अंडाशय के ठीक पास डिंबवाहिनी का हिस्सा कीप के आकार का होता है, जिसे कीपक (इंपफन्डीबुलम)
कहा जाता है। इस कीपक के किनारे अंगुलि सदृश्य प्रक्षेप (प्रोजेक्शन) होते हैं, जिसे झालर (फिम्ब्री) कहते हैं। अंडोत्सर्ग
के दौरान अंडाशय से उत्सर्जित अंडाणु को संग्रह करने में ये झालर सहायक होते हैं। कीपक
आगे चलकर अंडवाहिनी के एक चैड़े भाग में खुलता है, जिसे तुंबिका (एंपुला) कहते हैं। अंडवाहिनी
का अंतिम भाग संकीर्ण पथ (इस्थमस) में एक संकरी अवकाशिका
(ल्यूमेन) होती है, जो गर्भाशय को जोड़ती है। गर्भाशय केवल एक होता है और
इसे बच्चादानी (वुम्ब) भी कहते हैं। गर्भाशय
का आकार उल्टी रखी गई नाशपाती जैसा होता है। यह श्रोणि भित्ति से स्नायुओं द्वारा जुड़ा
होता है। गर्भाशय एक पतली ग्रीवा द्वारा योनि में खुलता है। ग्रीवा की गुहा को ग्रीवा
नाल (सर्वाइकल कैनाल) कहते हैं, जो योनि के साथ मिलकर जन्म-नाल (बर्थ कैनाल) की रचना करती है। गर्भाशय की भित्ति, ऊतकों की तीन परत वाली होती है। बाहरी पतली झिल्लीमय
स्तर को परिगर्भाशय (पेरिमैट्रियम), मध्य मोटी चिकनी पेशीय स्तर को गर्भाशय पेशी स्तर (मायोमैट्रियम) और आंतरिक ग्रंथिल स्तर को गर्भाशय अंतःस्तर
(एंडोमैट्रियम) कहते हैं, जो गर्भाशय गुहा को स्तरित करती हैं। आर्तव चक्र (मेन्सट्र˜अल
साइकिल) के दौरान गर्भाशय के अंतः स्तर में चक्रीय परिवर्तन होते हैं, जबकि गर्भाशय पेशीस्तर में प्रसव के समय कापफी तेज संवुफचन
होते हैं। स्त्री के बाह्य जननेंद्रिय के अन्तर्गत जघन शैल (मौंस प्यूबिस), वृहद भगोष्ठ (लेबिया मैजोरा), लघु भगोष्ठ (लेबिया
माइनोरा), योनिच्छद (हाइमेन) और भगशेपफ (क्लाइटोरिस)
आदि होते हैं। जघन शैल वसामय ऊतकों से बनी एक गद्दी सी होती है जो त्वचा और जघन-बालों
से ढँकी होती है। वृहद भगोष्ठ ऊतकों का माँसल वलन (पफोल्ड)
है, जो जघन शैल से नीचे तक पफैले होते
हैं और योनिद्वार को घेरे रहते हैं। लघु भगोष्ठ ऊतकों का एक जोड़ा वलन होता है और यह
वृहद भगोष्ठ के नीचे स्थित होता है। योनि का द्वार प्रायः एक पतली झिल्ली, जिसे योनिच्छद कहते हैं, से आंशिक रूप से ढका होता है। भगशेपफ एक छोटी सी अंगुलि
जैसी संरचना होती है जो मूत्र द्वार के ऊपर दो वृहद भगोष्ठ के ऊपरी मिलन बिन्दु के
पास स्थित होती है। योनिच्छद प्रायः पहले मैथुन (संभोग)
के दौरान पफट जाता है। हालाँकि यह आवरण कभी-कभी तेज ध्क्वेफ या अचानक गिरने से भी पफट
सकता है। इसके अलावा योनि टैम्पाॅन को घुसेड़ने या पिफर घोडे़ पर चढ़ने या साइकिल चलाने, आदि खेल वूफद की सक्रिय भागीदारी से भी पफट सकता है।
वुफछ औरतों का योनिच्छद संभोग के बाद भी बना रहता है। इसलिए योनिच्छद के होने अथवा
न होने की बात को किसी स्त्री के कौमार्य (वर्जिनिटी)
या यौन अनुभवों का वास्तविक सूचक नहीं माना जाना चाहिए। कार्यशील स्तन ग्रंथि सभी मादा
स्तनधारियों का अभिलक्षण है।
स्तन ग्रंथि का आरेखीय-काट दृश्य
स्तन ग्रंथियाँ (स्तन)
युग्म संरचना हैं जिनमें ग्रंथिल ऊतक और विभिन्न मात्र में  होते हैं। प्रत्येक
स्तन का ग्रंथिल ऊतक 15-20 स्तन पालियों (मैमरी
लोब्स) में विभक्त होता है। इसमें कोशिकाओं के गुच्छ होते हैं जिन्हें वूफपिका कहते
हैं। वूफपिकाओं की कोशिकाओं से दुग्ध् स्रवित होता है और जो वूफपिकाओं की गुहाओं (अवकाशिकाओं) में एकत्र होता है। वूफपिकाएँ स्तन नलिकाओं
में खुलती हैं। प्रत्येक पालि की नलिकाएँ मिलकर स्तनवाहिनी (मैमरी डक्ट्स) का निर्माण करती हैं। कई स्तन वाहिनियाँ
मिलकर एक वृहद स्तन तुंबिका बनाती है जो दुग्ध् वाहिनी (लैक्टिपफेरस डक्ट) से जुड़ी होती हैं जिससे की दूध् स्तन
से बाहर निकलता है।

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

मेरुरज्जु का सचित्र वर्णन करे

नमस्ते दोस्तों मै अभिषेक आज के इस पोस्ट के माध्यम से मेरुरज्जु का वर्णन किये है 

मेरूरज्जु (लैटिन: Medulla spinalis, जर्मन: Rückenmark, अंग्रेजी: Spinal cord), मध्य तंत्रिकातंत्र का वह भाग है, जो मस्तिष्क के नीचे से एक रज्जु (रस्सी) के रूप में पश्चकपालास्थि के पिछले और नीचे के भाग में स्थित महारंध्र (foramen magnum) द्वारा कपाल से बाहर आता है और कशेरूकाओं के मिलने से जो लंबा कशेरूका दंड जाता है उसकी बीच की नली में चला जाता है। यह रज्जु नीचे ओर प्रथम कटि कशेरूका तक विस्तृत है। यदि संपूर्ण मस्तिष्क को उठाकर देखें, तो यह 18 इंच लंबी श्वेत रंग की रज्जु उसके नीचे की ओर लटकती हुई दिखाई देगी। कशेरूक नलिका के ऊपरी 2/3 भाग में यह रज्जु स्थित है और उसके दोनों ओर से उन तंत्रिकाओं के मूल निकलते हैं, जिनके मिलने से तंत्रिका बनती है। यह तंत्रिका कशेरूकांतरिक रंध्रों (intervertebral foramen) से निकलकर शरीर के उसी खंड में फैल जाती हैं, जहाँ वे कशेरूक नलिका से निकली हैं। वक्ष प्रांत की बारहों मेरूतंत्रिका इसी प्रकार वक्ष और उदर में वितरित है। ग्रीवा और कटि तथा त्रिक खंडों से निकली हुई तंत्रिकाओं के विभाग मिलकर जालिकाएँ बना देते हैं जिनसे सूत्र दूर तक अंगों में फैलते हैं। इन दोनों प्रांतों में जहाँ वाहनी और कटित्रिक जालिकाएँ बनती हैं, वहाँ मेरूरज्जु अधिक चौड़ी और मोटी हो जाती है।
मस्तिष्क की भाँति मेरूरज्जु भी तीनों तानिकाओं से आवेष्टित है। सब से बाहर दृढ़ तानिका है, जो सारी कशेरूक नलिका को कशेरूकाओं के भीतर की ओर से आच्छादित करती है। किंतु कपाल की भाँति परिअस्थिक (periosteum) नहीं बनाती और न उसके कोई फलक निकलकर मेरूरज्जु में जाते हैं। उसके स्तरों के पृथक होने से रक्त के लौटने के लिये शिरानाल भी नहीं बनते जैसे कपाल में बनते हैं। वास्तव में मरूरज्जु पर की दृढ़तानिका मस्तिष्क पर की दृढ़ तानिका का केवल अंत: स्तर है।
दृढ़ तानिका के भीतर पारदर्शी, स्वच्छ, कोमल, जालक तानिका है। दोनों के बीच का स्थान अधोदृढ़ तानिका अवकाश (subdural space) कहा जाता है, जो दूसरे, या तीसरे त्रिक खंड तक विस्तृत है। सबसे भीतर मृदु तानिका है, जो मेरूरज्जु के भीतर अपने प्रवर्धों और सूत्रों को भेजती है। इस सूक्ष्म रक्त कोशिकाएँ होती हैं। इस तानिका के सूत्र तानिका से पृथक् नहीं किए जा सकते। मृदु तानिका और जालक तानिका के बीच के अवकाश को अधो जालक तानिका अवकाश कहा जाता है। इसमें प्रमस्तिष्क मेरूद्रव भरा रहता है।
नीचे की ओर द्वितीय कटि कशेरूका पर पहुँचकर रज्जु की मोटाई घट जाती है और वह एक कोणाकार शिखर में समाप्त हो जाती है। यह मेरूरज्जु पुच्छ (canda equina) कहलाता है। इस भाग से कई तंत्रिकाएँ नीचे को चली जाती हैं और एक चमकता हुआ कला निर्मित बंध (bond) नीचे की ओर जाकर अनुत्रिक (coccyx) के भीतर की ओर चला जाता है।


                                                 
मेरूरज्जु की स्थूल रचना
रज्जु की रचना जानने के लिये उसका अनुप्रस्थ काट (transverse section) काट लेना आवश्यक है। काट में दाहिने और बाँयें भाग समान रहते हैं। दोनों ओर के भागों के बीच में सामने ही ओर एक गहरा विदर, या परिखा (fissere) है जो रज्जु के अग्र पश्व व्यास के लगभग तिहाई भाग तक भीतर को चली जाता है। यह अग्रपरिखा है। पीछे की ओर भी ऐसी पश्वमध्य (postero median) परिखा है। वह अग्र मध्य (antero median) परिखा से गहरी किंतु संकुचित है। अग्र परिखा में मृदुतानिका भरी रहती है। पश्व परिखा में मृदुतानिका नहीं होती। पश्वपरिखा से तनिक बाहर की ओर पश्व पार्श्व परिखा (postero lateral fissure) है जिससे तंत्रिकाओं के पश्व मूल निकलते हैं। अग्र मूल सामने की ओर से निकलते है, किंतु उनका उद्गम किसी परिखा, या विदर से नहीं होता।
मेरूरज्जु में आकर धूसर और श्वेत पदार्थों की स्थिति उलटी हो जाती हे। श्वेत पदार्थ बाहर रहता है ओर धूसर पदार्थ उसके भीतर एच अक्षर के आकार में स्थित है।
धूसर पदार्थ की स्थिति ध्यान देने योग्य है। इसके बीच में एक मध्यनलिका (central canal) है जिसमें प्रमस्तिष्क मेरूद्रव चतुर्थ निलय से आता रहता है। वास्तव में इसी नलिका के विस्तृत हो जाने से चतुर्थ निलय बना है। नलिका के दोनों ओर रज्जु में समान भाग हैं, जो अग्र पश्व परिखाओं द्वारा दाहिने और बायें अर्धाशौं में विभक्त है। इस कारण एक ओर के वर्णन से दूसरी ओर भी वैसा ही समझना चाहिए।
श्वेत पदार्थ के भीतर धूसर पदार्थ का आगे की ओर को निकला हुआ भाग (H EòÉ +OÉ +vÉÉȶÉ) अग्र श्रृंग (anterio cornua) और पीछे की ओर का प्रवर्धित भाग पश्च श्रृंग (posterior cornua) कहलाता है। इन दोनों के बीच में पार्श्व की ओर को उभरा हुआ भाग पार्श्व श्रृंग (laterak horns) है, जो वक्ष प्रांत में विशेषतया विकसित है। भिन्न भिन्न प्रांतों में धूसर भाग के आकार में भिन्नता है। वक्ष और त्रिक प्रांतों में धूसर भाग विस्तृत है। इन विस्तृत भागों से उन बड़ी तंत्रिकाओं का उदय होता है, जो ऊर्ध्व ओर अधो शाखाओं के अंगों में फैली हुई हैं।
धूसर पदार्थ के बाहर श्वेत पदार्थ उन अभिवाही और अपवाही सूत्रों का बना हुआ है जिनके द्वारा संवेदनाएँ त्वचा तथा अंगों से उच्च केंद्रों में और अंत में प्रमस्तिष्क की प्रांतस्था में पहुंचती हैं तथा जिन सूत्रों द्वारा प्रांतस्था और अन्य केंद्रों से प्रेरणाएँ या संवेग अंगों और पेशियों में जाते हैं।

सूक्ष्म रचना

धूसर पदार्थ में तंत्रिका कोशाणु, में दस पिधान युक्त अथवा अयुक्त तंत्रिकातंतु तथा न्यूरोग्लिया होते हैं। कोशाणु विशेष समूहों में सामने, पार्श्व में और पीछे की ओर स्थित हों। ये कोशणु समूह स्तंभों (column) के आकार में रज्जु के धूसर भाग में ऊपर से नीचे को चले जाते हैं और भिन्न भिन्न स्तंभों के नाम से जाने जाते हैं। इस प्रखर अग्र, मध्य तथा पश्च कई स्तंभ बन गए हैं। ये मुख्य स्तंभ फिर कई छोटे-छोटे स्तंभों में विभक्त हो जाते हैं।
धूसर पदार्थ के बाहर श्वेत पदार्थ के भी इसी प्रकार कई स्तंभ हैं। यहाँ कोशिकाएँ नहीं हैं। केवल पिधानयुक्त सूत्र और न्यूरोग्लिया नामक संयोजक ऊतक हैं। सूत्रों के पुंज पथ (tract) कहलाते हैं, किंतु इन पथों को स्वस्थ दशा में सूक्ष्मदर्शी की सहायता से भी पहिचानना कठिन होता है। संवेदी तंत्रिकाओं के सूत्र पश्च मूल द्वारा मे डिग्री रज्जु में प्रवेश करते हैं, अवएव उनका संबंध पश्च श्रृंगों में स्थित कोशिकाओं में होता हैं और वहाँ से वे प्रमस्तिष्क की प्रांतस्था तक कई न्यूरोनों द्वारा तथा कई केंद्रकों से निकलकर पहुंचते हैं। कितने ही सूत्र पश्चिम श्रृंग की कोशिकाओं में अंत न होकर सीधे ऊपर चले जाते हैं। इसी प्रकार प्रेरक तंत्रिकाओं के सूत्र रज्जु के अग्रभाग में स्थित होते हैं और अग्र श्रृंगों के संबंध में रहते हैं।

मेरूरज्जु के कर्म (functions)

ये दो हैं:
  • (1) मेरूरज्जु द्वारा संवेगों का संवहन होता है। प्रांतस्था की कोशिकाओं में जो संवेग उत्पन्न होते हैं उनका अंगों, या पेशियों तक मेरूरज्जु के सूत्रों द्वारा ही संवहन होता है। त्वचा या अंगों से जो संवेग आते हैं, वे भी मेरूरज्जु के सूत्रों में होकर मस्तिष्क के केंद्रों तथा प्रांतस्था के संवेदी क्षेत्र में पहुंचते हैं।
  • (2) मेरूरज्जु के धूसर भाग में कोशिकापुंज भी स्थित हैं जिनका काम संवेगों को उत्पन्न करना तथा ग्रहण करना है। पश्च ओर के स्तंभों की कोशिकाएँ त्वचा और अंगों से आए हुए संवेगों को ग्रहण करती हैं। अग्र श्रृंग की कोशिकाएँ जिन संवेगों को उत्पन्न करती हैं वे पेशियों में पहुंच कर उनके संकोच का कारण होते हैं जिससे शरीर की गति होती है। अन्य अंगों के संचालन के लिये जो संवेग जाते हैं उनका उद्भव यहीं से होता है। संवेग के पश्चिम श्रृंग में पुहंचने पर जब वह संयोजक सूत्र द्वारा पूर्व श्रृंग में भेज दिया जाता है तो वहाँ की कोशिकाएँ नए संवेग को उत्पन्न करती हैं जो तंत्रिकाक्ष कोशिकाओं द्वारा, जिस पर आगे चलकर पिधान (medullated) चढ़ने से वे तंत्रिका सूत्र बन जाते हैं। इस प्रकार की क्रियाएँ प्रतिवर्ती क्रिया (reflex action) कहलाती हैं। मेरूरज्जु प्रतिवर्ती क्रियाओं का स्थान है।

प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Involuntory actions)

शरीर में प्रति क्षण सहस्रों प्रतिवर्ती क्रियाएँ होती रहती हैं। हृदय का स्पंदन, श्वास का आना जाना, पाचक तंत्र की पाचन क्रियाएँ, मल, या मुत्र त्याग, ये सब प्रतिवर्ती क्रियाएँ हैं जो मेरूरज्जु द्वारा होती रहती हैं; हाँ इन क्रियाओं का निमयन, घटना, बढ़ना मस्तिष्क में स्थित उच्च केंद्रों द्वारा होता है। हमारी अनेक इच्छाओं से उत्पन्न हुई क्रियाएँ भी, यद्यपि उनका उद्भव प्रमस्तिष्क के प्रांतस्था से हाता है किंतु आगे चलकर उनका संपादन मेरूरज्जु से प्रतिवर्ती क्रिया की भाँति होने लगता है। अपने मित्र से मिलने की इच्छा मस्तिष्क में उत्पन्न होती है। प्रांतस्था की प्रेरक क्षेत्र की कोशिकाएँ संबंधित पेशियों को संवेग, या प्रेरणाएँ भेजकर उनसे सब तैयारी करवा देती हैं और हम मित्र के घर की ओर चल देते हैं। हम बहुत प्रकार की बातें सोचते जाते हैं, कभी अखबार, या चित्र भी देखने लगते हैं, तो भी पाँव मित्र के घर के रास्ते पर ही चले जाते हैं। यहाँ प्रतिवर्ती क्रिया हो गई। जिस क्रिया का प्रारंभ मस्तिष्क से हुआ बा, वह मेरूरज्जु द्वारा होने लगी। इन प्रतिवर्ती क्रियाओं का नियमन मस्तिष्क द्वारा होता है। इन पर भी प्रांतस्था का सर्वोपरि अधिकार रहता है।

प्रतिवर्ती चाप (Reflex arc)

इससे उस समस्त मार्ग का प्रयोजन है जिसके द्वारा संवेग अपने उत्पत्ति स्थान से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क और मेरूरजजु) द्वारा अपने अंतिम स्थान पर पहुंचते हैं, जहाँ क्रिया होती है। इस मार्ग, या परावर्ती चाप के पाँच भाग होते हैं:
(1) संवेदी तंत्रिका सूत्रों के ग्राहक अंतांग (recepters or receptive nerve endings) जो त्वचा में, या अंगों के भीतर स्थित होते हैं। ज्ञानेंद्रियों, त्वचा, पेशियों, संधियों, आंत्रनाल की दीवार, फुफ्फुस, हृदय, इन सभी में ऐसे तंत्रअंतांग स्थित है जो वस्तुस्थिति में परिवर्तन के कारण उत्तेजित हो जाते हैं। यहीं से संवेग की उत्पत्ति होती है।
(2) अभिवाही तंत्रिका जिसके सूत्रों की कोशिकाएँ पश्चमूल की गंडिका (ganglion) में स्थित है।
(3) केंद्रीय तंत्रिकातंत्र (मस्तिष्क और मरूरज्जु)।
(4) अपवाही तंत्रिका और
(5) जिस अंग में तंत्रिका सूत्र के अंतांग स्थित हों, जैसे पेशी, लाला ग्रंथियाँ, हृदय, आंत्र, आदि। प्रथम अंतांगों से संवेग अभिवाही तंत्रिका द्वारा केंद्रीय तंत्र में पहुंचकर वहाँ से अभिवाही तंत्रिका में होकर दूसरे (प्ररेक) अंतांगों में पहुंचते है।
कुछ भागों मे ये पाँचों भाग होते हैं। कुछ में कम भी हैं। ये भाग वास्तव में न्यूरॉन (neuron) है। तंत्रिका कोशिका, उससे निकलने वाला लंबा तंत्रिकाक्ष (axon) जो आगे चलकर तंत्रिका का अक्ष सिलिंडर बन जाता है और कोशिका के डेंड्रोन (dendron) मिलकर न्यूरॉन कहलाते है। डेंड्रोन में होकर संवेग कोशिका में जाता है। ये छोटे-छोटे होते हैं और कोशिका के शरीर से वृक्ष की शाखाओं की भाँति निकले रहते हैं। कोशिका के दूसरे कोने से तंत्रिकाक्ष निकलता है, जो पिधानयुक्त होने पर तंत्रिका में होकर दूर तक चला जाता है।
प्रतिवर्ती चाप में कम से कम दो न्यूरॉन होते हैं। जानु प्रतिवर्त (knee reflex) में दो न्यूरॉन है। किंतु इतनी छोटी चाप शरीर में एक दो ही हैं। अधिक अंगों में तीन, चार और पाँच न्यूरोन तक होते हैं। इनके द्वारा संवेग ग्राहक अंतांगों से लेकर अंतिम निर्दिष्ट स्थान या अंग तक पहुंचता है।


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